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शासन को 45 बार पत्र… पर अब तक नहीं मिली नौकरी
वर्तमान में चंद्रपूर जिले के पालकमंत्री तथा आदिवासी विभाग के मंत्री डॉ. अशोक उईके के कार्यकाल में 1 वर्ष पूर्व चंद्रपुर के आदिवासी विभाग में निवेदन देकर भी नौकरी की राह..
कभी चंद्रपूर जिले का गौरव बने ये पांच आदिवासी युवा आज भी नौकरी के इंतजार में हैं। जिन युवाओं ने 2018 में ‘मिशन शौर्य’ के तहत माउंट एवरेस्ट फतह कर देश में चंद्रपुर का नाम रोशन किया था, वे आज अपनी रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए खेती और अन्य छोटे-मोटे काम कर रहे हैं।
चंद्रपूर जिले के दुर्गम भाग कहे जाने वाले जिवती और कोरपना तालुका के मनीषा धुर्वे, विकास सोयाम, प्रमेश आडे, उमाकांत मडावी और कविदास कटमोडे – इन पांचों ने कठिन परिस्थितियों में एवरेस्ट पर तिरंगा लहराया था। उस समय तत्कालीन पालकमंत्री सुधीर मुनगंटीवार ने उन्हें सरकारी नौकरी देने का आश्वासन दिया था। मगर सात साल बीत गए, वादा अब तक अधूरा है।
इन युवाओं ने अब तक शासन को 45 पत्र लिखे हैं, पर जवाब एक भी नहीं। पिछले वर्ष वर्तमान पालकमंत्री एवं आदिवासी विकास मंत्री डॉ. अशोक उइके के विभाग के चंद्रपूर एकात्मिक आदिवासी विकास प्रकल्प को भी लिखित निवेदन सौंपा गया, मगर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
कविदास कटमोडे, जो इस समय शिवाजी कॉलेज, राजुरा में एम.ए. (मराठी) द्वितीय वर्ष की पढ़ाई कर रहे हैं, ने कहा, “हम पाँचों को उम्मीद थी कि सरकार अपने वादे पर खरी उतरेगी, पर अब तक कुछ नहीं हुआ। आज भी मैं खेती में परिवार का हाथ बँटाता हूँ। यदि सरकार ही हमें भुला देगी, तो नए युवाओं में हौसला कैसे रहेगा?” इनमे से दो पर्वतारोही स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी कर रहे हैं, जबकि बाकी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटे हैं। उनकी वित्तीय कठिनाइयाँ उन्हें आगे बढ़ने से रोक रही हैं, फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी है।
विडंबना यह है कि वर्तमान पालकमंत्री डॉ. अशोक उइके आदिवासी समुदाय से हैं, और वे जिले में अनेक मंचों में आदिवासी का राज चंद्रपूर में आया है, अब आदिवासियों का सम्मान हर क्षेत्र में होगा परंतु ये सिर्फ कहावत ही साबित हुई है, आज तक इन युवाओं को न्याय दिलाने में मंत्री महोदय विफल रहे हैं।
स्थानीय सामाजिक संगठनों ने राज्य सरकार से मांग की है कि इन युवाओं को उनकी उपलब्धि के अनुरूप सम्मान और नौकरी का अवसर तुरंत दिया जाए। लोगों का कहना है कि सरकार ने ऐसे युवाओं के लिए प्रेरणा बनने का मौका खो दिया है।
चंद्रपूर के पाँच आदिवासी युवा उस ऊंचाई पर पहुंचे, जहाँ पहुंचने का सपना भी दुर्लभ होता है। एवरेस्ट फतह करने के बाद उन्हें बधाइयाँ, मंच और आश्वासन तो मिले, मगर आज वही युवा दर-दर ठोकरें खा रहे हैं।सरकार के लिए यह विचारणीय है कि अगर ऐसी सफलताएँ भी बेरोजगारी में दब जाएँ, तो ग्रामीण-आदिवासी युवाओं को प्रेरणा कहाँ से मिलेगी? केवल घोषणाओं से नहीं, एक ईमानदार कदम से ही व्यवस्था पर भरोसा लौट सकता है। चंद्रपूर के इन पर्वतारोहियों को नौकरी देना किसी उपकार की बात नहीं, बल्कि न्याय और सम्मान लौटाने की जिम्मेदारी है। अब देखना यह है कि सरकार इस जिम्मेदारी को कब समझती है।
By – राममिलन सोनकर, चंद्रपूर








